sdasad
    • 30 JUL 18
    गव्यशाला- ग़रीबों की पाठशाला… हमें गर्व है…

    मैं बचपन से ही अपने जीवन मे बहुत सकारात्मकरहा हूँ ओर आत्मविश्वास तो ईश्वर ने कूट-२ कर भरा है | जब मैं पंचगव्य नया-२ सीख ही रहा था तो मैं अनेक गौशालाओं मे गया… सीखने-समझने का प्रयास किया | पर पता नही क्यो उस गौशाला से बाहर निकालकर अचानक मेरा सारा उत्साह समाप्त हो जाता था, एक संशय की स्तिथि उत्पन्न हो जाती थी ओर आत्मविश्वास तो किसी खाई मे कूदी मार देता था | क्यो होता था ऐसा…??

    कई दिनो तक विचार करने के पश्चात मैने पाया की भारत की जिन भी प्रमुख गौशालाओं मे हम प्रशिक्षण के लिए जाते है… वे गौशलाएँ अति संपन्न है | वहाँ अनेक कर्मचारी, बड़ी संख्या मे गाय, बड़ा निर्माण, अनेक आधुनिक यंत्र एवम् प्रचार के लिए बड़ी टीम होती है | अब जो वहाँ सीखने जाता है वह कुछ घंटो मे ही नकारात्मकता से घिर जाता है… पर क्यो…??

    बंद कर दो इन गौशालाओं को… नही बचेगी गाय !

    छात्र के मन मे सबसे पहला प्रश्न आता है… मैं इतनी गाय, निर्माण, कर्मचारी, यंत्र आदि कहाँ से लाउंगा ?? इसके लिए तो बहुत पैसे चाहिए होंगे…?? गाय से व्यापार करना कोई ग़रीब आदमी का काम नही… यह केवल संपन्न लोगो के लिए है… बस यही से वह नकारात्मक होकर काम छोड़ देता है |

    गाय से व्यापार किसी ग़रीब का काम नही…?? यह प्रश्न उसे तोड़ देता है…

    बस उसी दिन मैने इस प्रश्न का उत्तर देने की ठान ली थी… ओर आज जब हम सुनते है… “गव्यशाला- ग़रीबों की पाठशाला” तो हमें गर्व होता है |

    गव्यशाला में जब छात्र आता है तो आते ही सबसे पहले तो उसके मन मे भाव आता है भाई- ये मैं कहाँ आ गया ?? फंस तो नही गया ?? ये छोटी से कुटिया वाले मुझे क्या सीखाएंगे…?? ये तो मेरे घर से भी छोटा है… ये क्या सीखाएंगे मुझे…??

    ऐसा क्या है गव्यशाला में…?? क्यों होता है ऐसा…?? आइए जाने…

    हमने गव्यशाला को कुछ इस प्रकार बनाया है कि…. यहां उत्पाद निर्माण के लिए कोई यंत्र नही है, ना अधिक गाय है ओर ना ही गाय रखने के लिए बड़ा शेड, ना कोई बड़ा पक्का निर्माण… ना ही कर्मचारी… ना कोई प्रचार के लिए टीम…. बोले तो केवल ज्ञान के अलावा कुछ नही है |

    गाय को बचाने का काम सचिन तेंदुलकर का है ?

    अब निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी हमारे यहां आकर अपने आपको राजा समझता है, उसे लगता है की अरे ये सब तो मेरे पास पहले से ही… यह तो मैं झट से जाते ही कर लूँगा…

    बस उसने इतना सोच लिया ओर हमारा काम हो गया…. हम गव्यशाला मे व्यक्ति को ज्ञान देकर यह आत्मविश्वास पैदा करना चाहते है की बेटा… तुझे सच मे कुछ विशेष नही चाहिए… तू कर लेगा… ओर चुटकी मे कर लेगा…

    हमारे यहां की गई एक रिसर्च के अनुसार जहां बड़ी-2 गौशालाओं में जाकर 100 मे से केवल 3 व्यक्ति कार्य आरंभ करते है वही गव्यशाला में यह संख्या 48 से उपर है… कारण…?? हम धरातल से आरंभ करते है ओर चरम पर ले जाकर छोड़ते है… यह विश्वास जगा देते है… की बेटा हमारे पास तो कुछ भी नही है… तेरे पास हमसे अधिक है…. तू कर लेगा बेटा….

    राजीव भाई के नाम को किया बदनाम

    कुछ ऐसे ही अनुभव का पिछला वीडियो हमने यहाँ डाला था जो दूसरे शिविर के पश्चात कुछ ऐसा हो गया 🙂 … ओर अभी पिछले शिविर मे बारा, राजस्थान के हर्षवर्धन भाई का नीचे दिया गया वीडियो हमें गर्व की अनुभूति देता है…. आइए देखें

    अत: हमें गर्व है… 🙂

     

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